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Tuesday, June 9, 2009

हम तुम एक डाल के पंछी


हम तुम एक डाल के पंछी, आओ हिल-मिल कर कुछ गायें

अपनी प्यास बुझाएं सारी धरती के आंसू पी जाएँ

अपनी ऊंचाई पर नीले

अम्बर को अभिमान बहुत है

वैसे इन पंखों की क्षमता

उसको भली प्रकार विदित है

तिनके चुन-चुन कर हम आओ ऐसा कोई नीड़ बनाएं

जिसमें अपने तो अपने कुछ औरों के भी घर बस जाएँ १

धूल पी गयी उसी बूंद को,

जो धारा से अलग हो गयी

हवा बबूलों वाले वन में

बहते-बहते तेज़ हो गयी

इधर द्वारिका है, बेचारा शायद कभी सुदामा आए

आओ, हम उसकी राहों में काँटों से पहले बिछ जायें २

कौन करेगा स्वयं धूप सह,

मरुथल से छाया की बातें

रुठेंगे दो-चार दिनों को,

चंदा और चांदनी रातें

अपत हुए सूखे पेडों की हरियाली वापस ले आयें

चातक से पाती लिखवा कर मेघों के घर तक हो आयें ३