माथे की बिंदी-हिन्दी
सजा रहे हो तो फिर इसको ऐसे मत बिसराइए।
माँ के माथे की बिंदी है, हिन्दी को अपनाइए॥
अपने आँगन में बिखरी है, केशर धोई चाँदनी।
उत्तर से ले कर दक्षिण तक बहती है मंदाकिनी॥
ज्योति पंथ पर स्वयं बहकते, शूल बिछाते जा रहे।
बाँहों वाले हो कर भी हम माँग-माँग कर खा रहे।
अपनी सोई हुई संस्कृति को फिर से आज जगाइए।
छोड़ विदेशी भाषा, अपनी हिन्दी को अपनाइए॥
भारत के सपूत क्यों भूले अपनेपन की आन को?
भारी ठेस लग रही अपने, गौरव को सम्मान को॥
भाव तुम्हारा अभी वही है, थोड़ा सा मतभेद है।
तुम्हें बाइबिल, हमें कराता जीवन-दर्शन वेद है॥
सुना सको तो हमें ‘सूर’ का कोई राग सुनाइए।
मरुथल में बहती सरिता सी हिन्दी को अपनाइए॥
जिसका निश्चित नहीं व्याकरण, जो बिलकुल स्वच्छंद है।
तन पर पुता पराग हृदय का कमल किंतु निर्गंध है॥
कब जाने किस ओर मुड़ेंगे इसके पाँव पता नहीं?
नियम-हीन जीवन में गति हो पर यह चेतनता नहीं॥
अधनंगी गोरी महिला को कंगन मत पहनाइए।
रघुकुल-तिलक, सती-सीता सी हिन्दी को अपनाइए॥
Thursday, September 15, 2011
Sunday, August 7, 2011
यों तुम्हारे काम ऐसे ही रहे;
पर देश का यौवन,
नहीं निर्जीव हो पाया।
अभी भी शक्ति है उसमें,
लड़ाई क्या लड़ोगे,
मत कसो लंगोट।
मेरी बात मानो,
दंभ छोड़ो और सत्ता का नशा भी।
अब तुम्हारी चाल
चलने की नहीं है।
और आगे दाल गलने की नहीं है:
क्योंकि पानी नाम का जो तत्व,
है बेहद ज़रूरी;
वह तुम्हारी आँख में
बिल्कुल नहीं है॥
पर देश का यौवन,
नहीं निर्जीव हो पाया।
अभी भी शक्ति है उसमें,
लड़ाई क्या लड़ोगे,
मत कसो लंगोट।
मेरी बात मानो,
दंभ छोड़ो और सत्ता का नशा भी।
अब तुम्हारी चाल
चलने की नहीं है।
और आगे दाल गलने की नहीं है:
क्योंकि पानी नाम का जो तत्व,
है बेहद ज़रूरी;
वह तुम्हारी आँख में
बिल्कुल नहीं है॥
Thursday, August 4, 2011
गंधवाही हवा अब कहाँ देश में।
बस धुआँ ही धुआँ, धुआँ ही धुआँ॥
धुंध में कोहरे में समाया हुआ,
सिन्धु पर चादरों सा बिछाया हुआ।
घुल गया साँस में, फिर उठा देह से,
व्योम तक सीढ़ियों सा, लगाया हुआ॥
दे उजाला, वह ज्वाला कहाँ जोश में,
बस फुआँ ही फुआँ है, फुआँ ही फुआँ॥
नाम घनश्याम का टेरते-टेरते,
इन्द्र-धनु की छटा हेरते-हेरते।
ओठ नीले पड़े, आँख पथरा गईं,
प्यास चटकी ज़बाँ फेरते-फेरते॥
एक भी बूँद पानी नहीं दीखता,
बस कुआँ ही कुआँ है, कुआँ ही कुआँ॥
बस धुआँ ही धुआँ, धुआँ ही धुआँ॥
धुंध में कोहरे में समाया हुआ,
सिन्धु पर चादरों सा बिछाया हुआ।
घुल गया साँस में, फिर उठा देह से,
व्योम तक सीढ़ियों सा, लगाया हुआ॥
दे उजाला, वह ज्वाला कहाँ जोश में,
बस फुआँ ही फुआँ है, फुआँ ही फुआँ॥
नाम घनश्याम का टेरते-टेरते,
इन्द्र-धनु की छटा हेरते-हेरते।
ओठ नीले पड़े, आँख पथरा गईं,
प्यास चटकी ज़बाँ फेरते-फेरते॥
एक भी बूँद पानी नहीं दीखता,
बस कुआँ ही कुआँ है, कुआँ ही कुआँ॥
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