यों तुम्हारे काम ऐसे ही रहे;
पर देश का यौवन,
नहीं निर्जीव हो पाया।
अभी भी शक्ति है उसमें,
लड़ाई क्या लड़ोगे,
मत कसो लंगोट।
मेरी बात मानो,
दंभ छोड़ो और सत्ता का नशा भी।
अब तुम्हारी चाल
चलने की नहीं है।
और आगे दाल गलने की नहीं है:
क्योंकि पानी नाम का जो तत्व,
है बेहद ज़रूरी;
वह तुम्हारी आँख में
बिल्कुल नहीं है॥
Sunday, August 7, 2011
Thursday, August 4, 2011
गंधवाही हवा अब कहाँ देश में।
बस धुआँ ही धुआँ, धुआँ ही धुआँ॥
धुंध में कोहरे में समाया हुआ,
सिन्धु पर चादरों सा बिछाया हुआ।
घुल गया साँस में, फिर उठा देह से,
व्योम तक सीढ़ियों सा, लगाया हुआ॥
दे उजाला, वह ज्वाला कहाँ जोश में,
बस फुआँ ही फुआँ है, फुआँ ही फुआँ॥
नाम घनश्याम का टेरते-टेरते,
इन्द्र-धनु की छटा हेरते-हेरते।
ओठ नीले पड़े, आँख पथरा गईं,
प्यास चटकी ज़बाँ फेरते-फेरते॥
एक भी बूँद पानी नहीं दीखता,
बस कुआँ ही कुआँ है, कुआँ ही कुआँ॥
बस धुआँ ही धुआँ, धुआँ ही धुआँ॥
धुंध में कोहरे में समाया हुआ,
सिन्धु पर चादरों सा बिछाया हुआ।
घुल गया साँस में, फिर उठा देह से,
व्योम तक सीढ़ियों सा, लगाया हुआ॥
दे उजाला, वह ज्वाला कहाँ जोश में,
बस फुआँ ही फुआँ है, फुआँ ही फुआँ॥
नाम घनश्याम का टेरते-टेरते,
इन्द्र-धनु की छटा हेरते-हेरते।
ओठ नीले पड़े, आँख पथरा गईं,
प्यास चटकी ज़बाँ फेरते-फेरते॥
एक भी बूँद पानी नहीं दीखता,
बस कुआँ ही कुआँ है, कुआँ ही कुआँ॥
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