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Thursday, August 4, 2011

गंधवाही हवा अब कहाँ देश में।
बस धुआँ ही धुआँ, धुआँ ही धुआँ॥

धुंध में कोहरे में समाया हुआ,
सिन्धु पर चादरों सा बिछाया हुआ।
घुल गया साँस में, फिर उठा देह से,
व्योम तक सीढ़ियों सा, लगाया हुआ॥

दे उजाला, वह ज्वाला कहाँ जोश में,
बस फुआँ ही फुआँ है, फुआँ ही फुआँ॥

नाम घनश्याम का टेरते-टेरते,
इन्द्र-धनु की छटा हेरते-हेरते।
ओठ नीले पड़े, आँख पथरा गईं,
प्यास चटकी ज़बाँ फेरते-फेरते॥

एक भी बूँद पानी नहीं दीखता,
बस कुआँ ही कुआँ है, कुआँ ही कुआँ॥

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