यों तुम्हारे काम ऐसे ही रहे;
पर देश का यौवन,
नहीं निर्जीव हो पाया।
अभी भी शक्ति है उसमें,
लड़ाई क्या लड़ोगे,
मत कसो लंगोट।
मेरी बात मानो,
दंभ छोड़ो और सत्ता का नशा भी।
अब तुम्हारी चाल
चलने की नहीं है।
और आगे दाल गलने की नहीं है:
क्योंकि पानी नाम का जो तत्व,
है बेहद ज़रूरी;
वह तुम्हारी आँख में
बिल्कुल नहीं है॥
Sunday, August 7, 2011
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