माथे की बिंदी-हिन्दी
सजा रहे हो तो फिर इसको ऐसे मत बिसराइए।
माँ के माथे की बिंदी है, हिन्दी को अपनाइए॥
अपने आँगन में बिखरी है, केशर धोई चाँदनी।
उत्तर से ले कर दक्षिण तक बहती है मंदाकिनी॥
ज्योति पंथ पर स्वयं बहकते, शूल बिछाते जा रहे।
बाँहों वाले हो कर भी हम माँग-माँग कर खा रहे।
अपनी सोई हुई संस्कृति को फिर से आज जगाइए।
छोड़ विदेशी भाषा, अपनी हिन्दी को अपनाइए॥
भारत के सपूत क्यों भूले अपनेपन की आन को?
भारी ठेस लग रही अपने, गौरव को सम्मान को॥
भाव तुम्हारा अभी वही है, थोड़ा सा मतभेद है।
तुम्हें बाइबिल, हमें कराता जीवन-दर्शन वेद है॥
सुना सको तो हमें ‘सूर’ का कोई राग सुनाइए।
मरुथल में बहती सरिता सी हिन्दी को अपनाइए॥
जिसका निश्चित नहीं व्याकरण, जो बिलकुल स्वच्छंद है।
तन पर पुता पराग हृदय का कमल किंतु निर्गंध है॥
कब जाने किस ओर मुड़ेंगे इसके पाँव पता नहीं?
नियम-हीन जीवन में गति हो पर यह चेतनता नहीं॥
अधनंगी गोरी महिला को कंगन मत पहनाइए।
रघुकुल-तिलक, सती-सीता सी हिन्दी को अपनाइए॥
Thursday, September 15, 2011
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